प्रकृति ऊर्जा चक्र के दो धुरी
पंचमहाभूतों को शुद्ध, सजीव करने के लिए निम्न दो कार्य अनिवार्य है
🔥 अग्निहोत्र -ठीक सूर्योदय, सूर्यास्त के समय किया जाने वाला यज्ञ
🐄 गौपालन -भारतीय नस्ल के गाय का पालन
अग्निहोत्र की प्रक्रिया से प्रकृति की छह मूल ऊर्जाएँ—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, कुश्माण्डा, स्कंदमाता, कालरात्रि और महागौरी—सक्रिय होती हैं, और इन्हें नियंत्रित करने वाली तीन ऊर्जाएँ—चंद्रघंटा, कात्यायनी और सिद्धिदात्री—भी प्रकट होती हैं। इन नौ ऊर्जाओं के संयोग से ब्रह्म ऊर्जा, विष्णु ऊर्जा और शिव ऊर्जा की निर्मिति होती है, जो पंचमहाभूतों की पाँचों तन्मात्राओं—रूप, रंग, गंध, स्वर और स्पर्श—को भौतिक रूप में प्रकट करती हैं। जब इन सूक्ष्म ऊर्जाओं के साथ गाय के पंचगव्य (गोबर, गौमूत्र, दही, छाछ और घी) का संयोजन होता है, तब मन, बुद्धि और अहंकार का निर्माण शुरू होता है; सूक्ष्म सृष्टि के जीवाणु उत्पन्न होने लगते हैं और दिखने वाली भौतिक दुनिया अधिक स्वस्थ, पोषित और समृद्ध होती जाती है। इस प्रकार सम्पूर्ण पारिस्थितिक तंत्र स्वयंपोषी, स्वयंविकासी और स्वयंपूर्ण रूप में स्थापित हो जाता है।

इस प्रकृति में दो तरह की सजीव दुनिया अपना जीवन पूरा कर रही है।
पहली दुनिया है- सुक्ष्म दुनिया
दुसरी दुनिया है- स्थूल दुनिया
सुक्ष्म दुनिया में सप्त ऊर्जा, सुक्ष्म अणु और जीवाणु है। सुक्ष्म अणुओं से भी छोटी छोटी इकाइयां हैं, स्थुल दुनिया में कीट, पतंगों से लेकर बड़े तरह के जीव पशु, पक्षी इतना ही नहीं धरती चांद तारे जैसे ग्रह, उपग्रह भी है।
स्थुल दुनिया जो हमें दिखाई देती है वो मात्र 4 प्रतिशत है। इस 4 प्रतिशत दुनिया को पोषण देने का काम गौमाता करती है। गाय के पंचगव्य स्थुल दुनिया को पोषण देती है। गौमाता से निकला हुआ गौमुत्र जिसमें सभी तरह के अणु होते है। गौमाता से निकला हुआ गोबर मे सभी तरह के जीवाणु होते हैं। अणुओं और जीवाणु को संसार को शुरू करते ही अणुओं और जीवाणुओ की दुनिया यानी अण्डज (वायरस), द्विदज (फंगश) स्वेदज, जरायुज ऐसे जीवों की उत्पत्ति होती है। जरायुज यानी जो गर्भ में रखकर जो अपने बच्चों को पैदा करती है, और प्रकृति का निर्माण करती है। इसी में बहुत से पशु, पक्षी, मनुष्य आते है, इस स्थूल प्रकृति के पोषण का आधार गौमाता है। गौमाता के पंचगव्य से प्रकृति का पोषण तो होता ही है। इसके अलावा गौमाता सूक्ष्म दुनिया के जीवों (ऊर्जा व अणु आदि जिन्हे हम दुर्गा, विष्णु, ब्रम्हा, शंकर, गणेश, इंद्र, सूर्य आदि 33 कोटि देवता कहते है) उनके पोषण यानी भोजन की व्यवस्था की सामग्री (कंडे, घी चावल) भी उपलब्ध कराती है। अब इस प्रकृति की सूक्ष्म दुनिया का ऊर्जा केंद्र शुरू होता है वह है अग्निहोत्र।
गाय समस्त विश्व को बनाने वाली सात ऊर्जाओं का इस धरा पर बीज स्वरूप में अवतार है, अपने आप में ऊर्जा का बीज हैं। सात ऊर्जा यानी शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद् रघंटा, कुष्मांडा, स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि इन सात ऊर्जाओं का सूक्ष्म बीज का नाम महागौरी (गाय) है।
जैसे पीपल का पूरा पेड़ एक बीज में समाहित होता है, ऐसे ही इतने बड़े ब्रह्माण्ड का बीज गाय है। गाय की जो ऊर्जा की परिपूर्णता घी है। गाय का गोबर पूरा पूरा कार्बन है पर इसके जलने से कार्बन डाई आक्साइड की अनुभूति नही होती, कार्बन डाई आक्साइड के निकलने से आंख में आंसू आते है, श्वांस में दिक्कत आती है, मुझे 12 वर्ष हो गए अग्निहोत्र करते, आज तक ये अनुभूति नही हुई, इस आधार पर मैं कहता हूं कि गाय के गोबर के कंडो के कार्बन के जलने में कार्बन डाईआक्साइड बनाने की प्रकृति का नियम लागू नही होता है,
चावल की पूर्ति मनुष्य (किसान) के जीवन की पूर्णता है। जब अग्निहोत्र के पात्र में गौमाता के सूखे गोबर के कंडे जलकर 400 डिग्री टेम्पेरचर तापमान बनाता है और उसमें जब घी (गाय के जीवन की पूर्णता) और चावल (मानव के जीवन की पूर्णता) डाला जाता है तो वो इस कार्य (अग्निहोत्र) से बाहर जो सूक्ष्म होकर हवा में आता है, यही पंच महाभूतों और सूक्ष्माणुओं का पोषण (भोजन) है। मनुष्यों का कर्म कृषि है और उसके कार्य की परिणीति ही है यह चावल, जब घी और चावल अग्निहोत्र की आहुति में जाते है, तो वह सभी ऊर्जा उत्पन्न होती है जो सूक्ष्मा दुनिया को भोजन के लिए पर्याप्त होती है।
अग्नि प्रकृति का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। सूक्ष्म दुनिया को भोजन देने वाली इकाई है, इसलिए अग्निहोत्र को भगवान कृष्ण ने कामधेनु कहा, मतलब सब कुछ देने वाली, 96% सूक्ष्म दुनिया को भोजन देने वाली इकाई कहा, फिर दूसरा कामधेनु भगवान कृष्ण ने गाय को कहा है, ताराचंद बेलजी तकनीकी कृषि व जीवन शैली के अपने प्रयोग में हमने कई बार दिखाया भी है कि पंचगव्य इस प्रकृति के सभी जीवों का पोषण है और ना केवल पोषण है, पंचगव्य से सभी तरह के जीवाणुओं की भी उत्पत्ति होती है। और जीवाणुओं की उत्पत्ति होते ही प्रकृति का ईकोसिस्टम पारिस्थितिक तंत्र शुरू हो जाता है। गाय के गोबर में सभी तरह के जीवाणु है तो इस स्थूल प्रकृति और जीवाणुओं से शुरू होती है।
इसलिए गाय ऊर्जा का दूसरा महत्वपूर्ण केंद्र है। सूक्ष्म दुनिया को ऊर्जा और पोषण देने का काम अग्निहोत्र करती है और स्थूल दुनिया को ऊर्जा और पोषण देने का काम गाय करती है।
प्रकृति 5 महाभूतों (महाजीवों) से बनी है
पंचमहाभूत अर्थात पांच महाजीव (भूमि गगन वायु अग्नि नीर) जिन्होंने इस धरती में जीवन की विशाल रचना खड़ी की जिसे हम अपरा ऊर्जा- प्रकृति कहते हैं और इसका संचालन परा ऊर्जा करती है।


पंचमहाभूत (भूमि, गगन, वायु, अग्नि, नीर) को शुद्ध, सजीव शक्तिशाली करके जिन किसानों ने TCBT रसायन मुक्त खेती की है उनकी खेती से अनेक तरह के फसलों के बहु त सुंदर सुंदर चित्र और वीडियो आ रहे है, मेरे फे सबुक पेज और यूटयूब चैनल “ताराचंद बेलजी की पाठशाला” पर जाकर देखे, RAH FPO मोबाइल एप्प डाउनलोड करके पूरा विषय सुने देखे समझे।
TCBT पंचमहाभूत ऊर्जा विज्ञान को समझने के लिए निम्न लेख को पूरा पढ़े और खेती कर
“️प्रकृति पंच भूतानि️”
प्रकृति 5 महाभूतों (महाजीवों) से बनी है
पंचमहाभूत अर्थात पांच महाजीव (भूमि, गगन, वायु, अग्नि, नीर) जिन्होंने इस धरती में जीवन की विशाल रचना खड़ी की जिसे हम आज प्रकृति कहते हैं। प्रकृति निर्माण की रचना में -
- भूमि माता है
- गगन पिता है
- वायु प्राण है
- अग्नि स्फूर् है ति
- नीर जीवन है

अभी मैं आपको पंचमहाभूत संतुलन विज्ञान बता रहा हूं।
पंचमहाभूतों को भगवान कृ ष्ण ने “अपरा ऊर्जा” कहा है, अपरा उर्जा मतलब जिस उर्जा की बनी हु ई रचना अपरिवर्त है।
हमारे शरीर में पंचमहाभूत रचना जीवन भर स्थिर रहनी चाहिए,हम जब मां के गर्भ से पैदा होते हैं तो हमारे शरीर में 70% जल तत्व, 8% आकाश तत्व, 1% भूमि तत्व, और 21% वायु तत्व,अग्नि तत्व सबमें तय मात्रा में समाहित होता है,अग्नि अंतरभूत होता है अतः इसे प्रतिशत में नही गिना जा सकता है, इतने महाभूताें का संतुलन पूरे जीवन भर हमारे शरीर में स्थिर रहना चाहिए, क्योंकि यही प्रकृति ने हमारी शरीर रचना का संतुलन तय किया है, इस संतुलन को जीवन भर हमें बनाए रखना ही पड़ता है, अगर यह संतुलन गड़बड़ा गया तो हमारे शरीर में दोष उत्पन्न हो जाता है जिसे त्रिदोष कहा गया है- जैसे जल तत्व घट गया या अग्नि तत्व बढ़ गया तो हमारे शरीर में पित्त दोष उत्पन्न हो जाता है,आंखें लाल हो जाती है, जीभ लाल हो जाती है, तलवे में लालिमा आ जाती है, नींद नहीं आती, बार-बार नींद खुलती है, बार-बार पसीना आता है, यह सब पित्त दोष के लक्षण है। इस स्थिति में हमें हमारे शरीर में जल तत्व को बढ़ाने के उपाय या अग्नि को घटाने के उपाय करने पड़ेंगे।

