TCBT वृक्षायुर्वेद विज्ञान
प्रकृति के पंच महाभूत का संतुलन - स्वस्थ फसलों का आधार
तत्वों का विवरण
प्रत्येक तत्व की विशेषताएं और कृषि में उनका महत्व
भूमि तत्व
सूक्ष्म इकाई: रूप | भूमि का स्वरूप: ठोस
भूमि तत्व प्रकृति का आधार तत्व है माता तत्व है, यही तत्व से शेष 4 महाभूत का आंकलन किया जा सकता है, इसकी तृण मात्रा (सूक्ष्म उर्जा इकाई) को रुप कहा गया है। भूमि से निकालने पर इसका स्वरूप ठोस मिलता है, गगन में इसका स्वरुप रंग कहलाता है, वायु में इसका स्वरुप गंध कहलाता है, अग्नि में इसका स्वरूप "स्वर" कहलाता है और नीर में इसका स्वरूप "स्पर्श" कहलाता है।
गगन तत्व
स्वभाव: रिक्त / शून्य | दर्शन: पिता तत्व
गगन तत्व रिक्त तत्व है, शून्य तत्व है, इस तत्व का निर्माण केवल 3 ऊर्जाओं शैलपुत्री, ब्रम्हचारिणी व चंद्रघंटा से हुआ है। कोई भी पदार्थ इसी शून्य में (गगन तत्व में) पहुंचकर ऊर्जा में बदलता है, मनुष्य सहित सभी जीवो के अंदर की रिक्तता ही उसे ऊर्जा प्रदान करती है, प्रकृति के निर्माण में सबसे पहले आकाश तत्व का ही उदय हुआ, इसी ने ही अन्य तत्वों का निर्माण किया, सभी तत्व इसके अंदर होते है इसीलिए भारतीय दर्शन में इसे पिता तत्व कहा गया है। सभी जड़ चेतन के अंदर ऊर्जा प्राप्त करने के लिए गगन तत्व का होना आवश्यक है।
वायु तत्व
मुख्य गुण: प्रवाह
वायु मनुष्य में जीवन ऊर्जा का प्रवाह है. हम जो भी पोषण लेते हैं वह प्राण वायु (ऑक्सीजन) वायु के साथ मिलकर हमारे शरीर के रोम-रोम तक जाता है, और वहां जीवन ऊर्जा उत्पन्न करता है पोषण देता है। ऊर्जा के साथ साथ शरीर में रस, रक्त, मांस, मज्जा, अस्थि, मेधा और वीर्य भी बनाता है, वायु का गुण प्रवाह है, सतत प्रवाह इससे हमारे शरीर को लचक देता है।
अग्निन तत्व
मुख्य भूमिका: शुद्धि + रूपांतरण
अग्निन तत्व ऊर्जा को पदार्थ में और पदार्थ को ऊर्जा में बदलने वाला तत्व है, इसका सब स्थानों पर प्रकृति द्वारा नियत स्थिति में सम रहना आवश्यक है, जैसे ही विषम होता है, जीवन रचना ही बदल जाती है। यह शेष महाभूतों सहित अन्य जड़ चेतन को शुद्ध करने में अपनी भूमिका निभाता है। ताराचंद बेलजी कृषि तकनीक में अग्निहोत्र अनिवार्य यज्ञ भाग है, अग्निहोत्र यज्ञ से ही पंचमहाभूतों को शुद्ध और शक्तिशाली बनाया जाता है।
जल तत्व
सूक्ष्म इकाई: नीर | मुख्य कार्य: ऊर्जा का बंधन
जल तत्व की सूक्ष्म इकाई नीर कहलाती है, जो सबकी प्यास बुझाती दे, सबको जीवन देती है। ऊर्जा को बांधने का काम जल तत्व ही करता है, जल तत्व ही ऊर्जा को प्रत्येक अंगों तक पहुंचा कर उनका आहार पूर्ण करने का काम करता है, जिसे "प्रत्याहार" कहा गया है। हमने प्राकृतिक खेती में जब से जल के साथ ऊर्जा को, अणुओं को, जीवाणु को फसलों में देना शुरु किया यथा ऊर्जा जल, अणु जल, जीवाणु जल, भूमि जल, मीठा जल, सजीव जल आदि.. तब से ही हमे पूर्ण प्रभावी परिणाम प्राप्त हुए है।
