
प्रकृति को बनाने वाली ऊर्जाएं
- शैलपुत्री, ब्रम्हचारिणी, चंद्रघंटा, कुष्माण्डा, स्कन्दमाता, कात्यायनी, कालरात्रि ये सात ऊर्जा प्रकृति और ब्रम्हांण का निर्माण करती हैं।
- आठवीं ऊर्जा महागौरी (गाय) उक्त सातों ऊर्जा का बीज रूप है। इस बीज से अर्थात गाय के पालन-पोषण से उक्त सातों ऊर्जा को प्राप्त करके प्रकृति के सभी पदार्थों का निर्माण किया जा सकता है।
- गाय के पंचगव्य से पंचमहाभूत शुद्ध, सजीव और शक्तिशाली होते हैं।
ऊर्जा की गति

- दोनों गतियाँ दो तरह की प्रकृति (इकोलॉजी) का निर्माण करती हैं।
- दोनों प्रकृतियाँ (इकोलॉजी) एक-दूसरे के विरोधक-संहारक होते हैं।
- दोनों इकोलॉजी को हम रूप, रंग, गंध, स्वर, स्पर्श से समझ सकते हैं या माप सकते हैं।
- इसी आधार पर इकोलॉजी अच्छा या बुरा (खराब) अर्थात सकारात्मक- नकारात्मक में पहचान बना लेती है।
- सकारात्मक ऊर्जा प्रकृति का सृजन करती है, नकारात्मक ऊर्जा प्रकृति का विघटन करती है।
सूखे गोबर का ढेर (घूरा) का ऊर्जा चक्र

कृषि करते समय या भूमि उपचार के दौरान घूरे का कच्चा गोबर खेत में ना डालें, यह गोबर खेत में फंगस, वायरस, कीट व खरपतवारों को बढ़ाता है। यह फसल की शत्रु इकोलॉजी को जन्म देता है, जिससे खेती में कई परेशानियाँ पैदा होती है। श्री ताराचंद बेलजी (गुरुजी) ने इस इकोलॉजी का विस्तारपूर्वक विश्लेषन किया है, जिसका रेखा चित्र निम्नांकित है - घूरे की गोबर की ऊर्जा का आणविक परिवर्तन जहाँ जैसी ऊर्जा होती है वहाँ वैसे ही अणु और जीवाणु उत्पन्न होते हैं। घूरे के गोबर में नकारात्मक ऊर्जा होने से उसमें नाकारात्मक अणु बनते हैं। इसका प्रमाण यह है कि इस ऊर्जा से बने हुए उक्त सभी जीव लचीले, चमकीले और आलसी हैं। ऐसे ही इस खाद से उत्पन्न कार्बन, फास्फोरस पोटास में ऐसे ही गुण होंगे, जिससे पौधा लचीला, चमकीला और आलसी रहता है। पौधे की पत्तियाँ चमकदार तो होती हैं पर ऐसी फसल से उपज कम आती है। ऐसा प्राकृतिक खेती शोध संस्था से जुड़े बहुत से किसानों का अनुभव है। इसी तरह से इस गोबर को जिस खेत में डाला जाता है वहाँ बहुत खरपतवार उगते हैं, वायरस, फंगस और रस चूसक कीट बहुतायत उत्पन्न होते हैं। इससे सिद्ध होता है, जैसे ऊर्जा होगी वैसे अणु और जीवाणु उत्पन्न होते हैं।
समाधान- गोबर को 2 फुट की ऊंचाई में फैलाएं, पानी डालकर ठंडा करें, बीच-बीच में छेद करके प्रति ट्राली गोबर के मान से हाई सीएन रेशियो घोल (देशी गाय का गोबर, जीवाणु जल, जैव रसायन, जीवन ऊर्जा, अन्न द्रव्य रसायन, भस्म रसायन, षडरस) इन सबको इस सूखे गोबर में अच्छे से मिलाएं, 15 दिन बाद उक्त घोल को पुनः मिलते हुए उलटा-पलटा कर दें, एक माह में सजीव कम्पोस्ट खाद बनकर तैयार हो जाता है। बुवाई पूर्व जमीन में प्रति ट्राली, प्रति एकड़ इस खाद का भुरकाव करे दें।


