TCBT वृक्षायुर्वेद विज्ञान : पंचमहाभूत कृषि 'खेती का कार्य पंचमहाभूतों से करवाएं'
ताराचंद बेलजी तकनीक वृक्षायुर्वेद ज्ञान आधारित कृषि है, जिसमें खेती का कार्य पंचमहाभूत अर्थात भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर ये पांच महाभूत करते हैं। इन पंचमहाभूतों को शुद्ध सजीव और शक्तिशाली, संस्कारित करके किसान को केवल निश्चित नक्षत्र पर बीज बोना है और फसल की सुरक्षा करनी है। यह मूल प्राकृतिक खेती है, यह सतयुग की खेती है। जिन किसानों ने इस खेती के प्रथम चरण, द्वितीय चरण, तृतीय चरण और चतुर्थ चरण की प्रक्रिया पूरी कर ली है अर्थात ये किसान अपनी खेती को पूरी तरह से रसायन मुक्त, जहर मुक्त बना लिया है, भूमि उपचार पूरा कर लिया है, उन किसानों की बहुत शानदार उत्पादन के वीडियो आ रहे हैं। अभी तक 38 तरह के फसलों के अधिकतम उत्पादन के वीडियो आ चुके हैं। ताराचंद बेलजी के यू-ट्यूब चैनल "TCBT पाठशाला" और फेसबुक पेज पर जाकर इन सभी वीडियो को देख सकते हैं। TCBT के इस वृक्षायुर्वेद विज्ञान को पूरा समझने के लिए ताराचंद बेलजी द्वारा लिखित पुस्तक-" वृक्षायुर्वेद विज्ञान : पंचमहाभूत कृषि" को पढ़ें, पुस्तक के कुछ अंश निम्न लेख में जारी किए जा रहे हैं।
"प्रकृति पंच भूतानि"
प्रकृति 5 महाभूतों (महाजीवों) से बनी है
पंचमहाभूत अर्थात पांच महाजीव (भूमि गगन वायु अग्नि नीर) जिन्होंने इस धरती में जीवन की विशाल रचना खड़ी की जिसे हम आज प्रकृति कहते हैं। प्रकृति निर्माण की रचना में -
भूमि माता है - यह बीजों को उगाती है, पोषण देती है।
गगन पिता है- यह फूल खिलाता है, बीज बनाता है।
वायु प्राण है- हर कोशिका को प्राण देता है।
अग्नि स्फूर्ति है- कोशिका को निरंतर उष्मा देता है।
नीर जीवन है- हर कोशिका का जीवन पूर्ण करता है।
अभी मैं आपको पंचमहाभूत संतुलन विज्ञान बता रहा हूं। पंचमहाभूतों को भगवान कृष्ण ने "अपरा ऊर्जा" कहा है, अपरा उर्जा मतलब, उर्जा के अनुपात की स्थिरता अर्थात पंचमहाभूतों की ऊर्जा अपरिवर्तित है। हमारे शरीर में पंचमहाभूत रचना जीवन भर स्थिर रहनी चाहिए, हम जब मां के गर्भसे पैदा होते हैं तो हमारे शरीर में 70% जल तत्व, 8% आकाश तत्व, 1% भूमि तत्व, और 21% वायु तत्व, अग्नि तत्व सबमें तय मात्रा में समाहित होता है, अग्नि अंतरभूत होता है अतः इसे प्रतिशत में नही गिना जा सकता है, इतने महाभूतों का संतुलन पूरे जीवन भर हमारे शरीर में स्थिर रहना चाहिए, क्योंकि यही प्रकृति ने हमारी शरीर रचना का संतुलन तय किया है, इस संतुलन को जीवन भर हमें बनाए रखना ही पड़ता है, अगर यह संतुलन गड़बड़ा गया तो हमारे शरीर में दोष उत्पन्न हो जाता है जिसे त्रिदोष कहा गया है- जैसे जल तत्व घट गया या अग्नि तत्व बढ़ गया तो हमारे शरीर में पित्त दोष उत्पन्न हो जाता है, आंखें लाल हो जाती है, जीभ लाल हो जाती है, तलवे में लालिमा आ जाती है, नींद नहीं आती, बार-बार नींद खुलती है, बार-बार पसीना आता है, यह सब पित्त दोष के लक्षण है। इस स्थिति में हमें हमारे शरीर में जल तत्व को बढ़ाने के उपाय या अग्नि को घटाने के उपाय करने पड़ेंगे। ऐसे ही यदि हमारे शरीर में जल तत्व ज्यादा बढ़ जाए या अग्नि तत्व कम हो जाए तो हमारे शरीर में कफ दोष उत्पन्न हो जाता है जिसका लक्षण है, सर्दी जुकाम होना, आलस्य ज्यादा होना, नींद बहुत आना, काम करने में मन ना लगना, आंख में सफेदी आना, जीभ सफेद होना आदि लक्षण है। ऐसी स्थिति में हमें पित्त बढ़ाने वाले उपाय करने पड़ेंगे। यदि शरीर में जल अग्नि के साथ साथ वायु भी बढ़ने लगे तो यह वात विकार हो जाता है, इसके लक्षण जीभ में कट-कट के निशान होना, फटने के निशान होना, हाथ पैरों में शिराओं का दिखना, चमड़ी में खुश्की आना, नींद नहीं आना, लकवा, साइटिका आधासीसी मस्तिष्क आदि बीमारियों का होना होता है। इस स्थिति में हमें त्रि-दोष नाशक उपाय करने पड़ते हैं। पूरी प्रकृति में किसी भी प्रकार का दोष या विकार उत्पन्न हो रहा है तो समझिए कि आपके पंचमहाभूत ऊर्जा असंतुलित हो गए हैं। अभी मैं पंचमहाभूत कृषि प्रवर्तक के नाते आपको कृषि में पंचमहाभूत संतुलन विज्ञान बता रहा हूं। सबसे पहले ऊर्जा जल डाल कर भूमि और जल को शुद्ध करना है, अग्निहोत्र के माध्यम से अग्नि, वायु और आकाश महाभूत को शुद्ध करना है, फिर इन्हें सजीव करने के लिए भूमि में जीवाणु जल, पानी में मीठा जल, वायु में गंध चिकित्सा करना आदि कार्य है, पंचमहाभूतों को शुद्ध सजीव करने के बाद इन्हें शक्तिशाली करने का कार्य करना होता है। ईस्वी वर्ष 2009 में प्राकृतिक खेती शोध संस्था बालाघाट की स्थापना के समय ही मैंने लक्ष्य रखा था कि मैं प्राकृतिक खेती के माध्यम से पंचमहाभूतों को शुद्ध सजीव और शक्तिशाली करूंगा, मेरा मुख्य उद्देश्य मेरे भगवान (भूमि-गगन-वायु-अग्नि-नीर) को शुद्ध सजीव और शक्तिशाली करना ही है, यही मेरी साधना और
यही मेरा लक्ष्य है, मैं अभी तक इन पंच महाभूतों को देखने, समझने, जांचने, परखने और कमी अधिक को ठीक करने के कार्य में अनेक लोगों को शिक्षित कर चुका हूं। मेरी शक्ति इतनी ही है, आगे का कार्य आपको करना है, मेरे भगवान मेरे इस कार्य का गौरव मुझे अवश्य देंगे, ऐसी मेरी कामना है। मेरे भगवान आज तक दूषित ही होते रहे है, किसी ने इन्हे जीवित समझा ही नहीं, किसी ने इनके दुख दर्द को देखा ही नहीं, महसूस ही नहीं किया, किसी ने इन्हे शुद्ध, सजीव शक्तिशाली करने के बारे में सोचा नही, चिंता नहीं की, जब प्रकृति बनाने वाले ये पंच महाभूत ही इतने दूषित हैं तो प्रकृति का दूषित होना तो लाजमी है, भगवान दूषित है तो इनसे बनी पूरी प्रकृति दूषित होगी ही, मैने इन्हे शुद्ध सजीव करने का अत्यंत सरल मार्ग बता दिया है, मेरा काम हो गया है अब आपका कार्य बचा है। अपने खुद के दुःखों से उबरने की थोड़ी सी भी आपमें इच्छा शक्ति है तो लग जाओ इस काम पर शायद मेरे ये भगवान आपको मोक्ष भी दें दे। क्योंकि आज के समय में प्रदूषित हो चुके भूमि, गगन, वायु, अग्नि, नीर को शुद्ध सजीव करने के अलावा अन्य सब काम बहुत छोटे है, गौड़ है। अपने पारिवारिक, सामाजिक, धार्मिक, राजनीतिक कार्यों के साथ इस काम को प्राथमिकता दो, आपकी खेती, आपका स्वास्थ्य सुदृढ़ हो ही जाएगा, आपको सभी सुख-दुःख से निवृत्ति (मोक्ष) मिल जायेगी। पूरी दुनिया का पेट भरने का काम किसान रुपी इंसान करता है, किसान ना केवल मानव समुदाय को अपितु प्रकृति के सभी पशु पक्षी कीट पतंग सूक्ष्म जीवाणुओं को अपनी कृषि के माध्यम से भोजन देता है, इंसान के मूल कर्म कृषि (प्रकृति के ऊर्जा चक्र के अनुसार खेती अर्थात TCBT कृषि) से पंचमहाभूत स्वतः स्वतःशुद्ध सजीव हो जाते है, इनको शुद्ध सजीव करने के लिए किसी को भी अतिरिक्त काम नही करना पड़ता है, परंतु रासायनिक खेती के भ्रम जाल ने किसान की बुद्धि फिरा दी, किसान पंचमहाभूतों से खेती करवाने के बजाय खुद खेती करने लगा, खाद पानी खुद देने लगा, मिट्टी के केंचुए को जुताई से हटा कर खुद ट्रेक्टर लगाकर जुताई करने लगा। केमिकल जहर और नकारात्मक ऊर्जा वाले खाद बीजों के उपयोग से पंचमहाभूत जितने दूषित हुए कृषि भी उतनी दूषित होती चली गई। सबको दूषित भोजन मिल रहा है, सब पीड़ित हैं, हाहाकार है, अगले 10 साल में शहर-शहर, गांव-गांव वायरस कैंसर से पीड़ित मानव, पशु पक्षी होंगे, रुपयों, डालर का इतना अवमूल्यन हो जाएगा, टोकने भर रुपयों से भी शुद्ध भोजन नही मिलेगा, पंचतत्व युक्त भोजन और छप्पन भोग वाटिका ही आपका जीवन बचा पाने में सक्षम रहेगी। मेरे अभी तक के कृषि अनुभव मुझे बता रहे हैं कि जिन किसानों ने पंचमहाभूत युक्त कृषि को अपनाया है, उनका जीवन धन्य हो गया है, उसका उत्पादन भी उसके जीवन के अभी तक के उत्पादन से ज्यादा मिलने लगा है, हम उत्पादन के मामले में रासायनिक खेती को बहुत पीछे छोड़ चुके है, केमिकल खेती से उपजी फसल व मानव स्वास्थ्य की बीमारियों को भी इस पंच महाभूत की खेती ने खत्म कर दिया है, हर किसान के खेत में हरी भरी स्वस्थ फसल आ रही है, दूषित और कठोर हो चुकी मिट्टी मक्खन जैसे मुलायम होती जा रही है, इस खेती से उपजे भोजन में विटामिन प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट से युक्त उच्च कोटि का खाद्यान्न मिल रहा है, जो खाने में स्वादिष्ट और शरीर के लिए पौष्टिक है, इसका खाद्यान्न में अणुओ और जीवाणुओ दोनों का संपूर्ण सुक्ष्म संसार है, इस प्रकृति में ऊर्जा को पकड़ने की क्षमता केवल मेरे भगवान (पंच महाभूत) में है, इन्हे अपनी खेती में स्थापित करो, इनसे उत्पन्न खाद्यान्न ऊर्जा से परिपूर्ण तो होगा ही, सभी प्रकार के अणुओं (मिनरल्स) और जीवाणुओं (एसिड्स, एंजाइम्स) से भी पूर्ण होगा। पंचमहाभूत युक्त ऊर्जा से भरा हुआ भोजन जो भी करेगा उसका शरीर मन- बुद्धि शुद्ध हो जाएगी सजीव हो जाएगी शक्तिशाली हो जाएगी। हे पंचमहाभूत, हम सब पर कृपा बनाए रखना, हम आपकी सहायता से कृषि कार्य के लिए सज्ज हैं, "धर्मो रक्षति रक्षितः" हम अपने धर्म अर्थात अपने कर्म अर्थात अपने कृषि पर अडिग रहेंगे, तो यह हमारा कर्म (कृषि) सदैव हमारी रक्षा करेगा।
ॐ तत्सत
ताराचंद बेलजी, संस्थापक
प्राकृतिक खेती शोध संस्था, बालाघाट


