TCBT JAIVIK KISHAN
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  • रासयनिक खेती से मूल प्राकृतिक खेती में जाने की चरणबद्ध प्रक्रिया

प्राकृतिक खेती की चरण

प्रथम चरण

करें और इसकी जगह पर जैविक कीटनाशक, या कीट नियंत्रक इस्तेमाल करें। रस चूसक कीटों के नियंत्रण के लिए कड़वे आसव या आरिष्ट का स्प्रे करें। नीम तेल, करंज तेल, अमृतधारा आदि का स्प्रे करें। टीसीबीटी वृक्षायुर्वेद विज्ञान के उत्पाद कडूआवस / गरूणारिष्ट/ नीमबाण से रस चूसक कीटों का नियंत्रण हो जाता है, बाजार से किसी भी तरह का कैमिकल डालने की जरूरत नहीं पड़ती है। ऐसे ही इल्लियों के नियंत्रण के लिए हरड़ रसायन / कुमारी आसव / नीम बाण इनके स्प्रे कर सकते हैं। ऐसे ही वायरस जनित बीमारियों के रोकथाम के लिए कालमेघारिष्ट और करंज बाण का स्प्रे कर सकते हैं।

फसलों में खनिज तत्वों की पूर्ति कर दें तो इससे भी रस चूसक कीट नहीं आते हैं।

प्रथम चरण में ही मिट्टी में कार्बन बढ़ाने के लिए वर्ष में 2 से तीन बार तिल की हरी खाद को जमीन पर गढ़ाए, अर्थात 4 से 5 किलो तिल को बोकर 35 से 40 दिन में रोटावेटर से चलाकर जमीन में गढ़ा दें और हर सिंचाई के पानी में ऊर्जा जल, जीवाणु जल मिलाकर ही चलाएं।

द्वितीय चरण

रसायनिक खेती के दूसरे दौर में किसान यूरिया, डीएपी जैसे रसायनिक खादों को ना डालें। फास्फेट फार्म के खाद एसेटिक होते हैं। इनको भी डालना बंद करें। सल्फेट फार्म के खनिज खाद निगेटिव होते हैं इन्हें भी डालना बंद करें। मूर्गी की खाद, कच्चे गोबर की खाद, दुर्गंध वाले खाद भी नहीं डालना है, इन खादों से मिट्टी का परिस्थितिकीय तंत्र बिगड़ जाता है, इन खादों से फंगस, वायरस, कीट और खरपतवार बढ़ जाते हैं। रसायनिक खादों की जगह प्रॉम खाद (फास्फोरस रीच आर्गेनिक मेन्यूर) राह फास्फो पोटाश खाद, खनिज खाद और टीसीबीटी वृक्षायुर्वेद विज्ञान के फार्मूलों और उत्पादों का प्रयोग करें।

तीसरा चरण

खेती के तीसरे चरण में किसान खरपतवार नाशकों का प्रयोग बंद करें। पहले और दूसरे चरण के दौर में टीसीबीटी भूमि उपचार की प्रक्रिया पूर्ण कर लेते हैं तो खरपतवार ऐसे ही उगने बंद हो जाते हैं। फिर भी यदि खरपतवार उगते हैं तो किसान बायो डिग्रेडेबल प्लास्टिक मलचिंग का उपयोग करें। या उगे हुए खरपतवारों को क्रत्रिम विधि से निदाई गुड़ाई करें।

चौथा चरण

चौथे चरण में किसान चार माह का समय निकालकर अपने खेतों में भूमि उपचार की प्रक्रिया को पूर्ण कर लें और खेत की मिट्टी को पंचमहाभूत ऊर्जा से पूर्ण कर लें। पंचमहाभूत से परिपूर्ण बीजों से ही बोवाई करें। इस चरण से किसान जैविक खेती की सभी मानकों को पूर्ण कर सकता है।

पाँचवा चरण

इस चरण में किसान को मिट्टी की जुताई बंद करनी है। खेत में 9 इंच गहराई, 9 इंच चौढ़ाई की 3-3 फुट में नालियाँ बनानी है, 3 फुट के बैड पर सन की हरी खाद की लाइव मलचिंग करनी है। या फसल अवशेषों की सूखी मलचिंग भी कर सकते हैं। ये स्थाई बेड कहलाएंगे, अब इन बेडों पर बीजों की बुवाई करना है, फसल लेते रहना है, नाली पर सिंचाई करना है। बचे हुए फसल अवशेषों को बेड पर बिछाते रहना है। फसलों के पंचमहाभूत संतुलन का ध्यान रखना है और जरूरत पड़ने पर टीसीबीटी के स्थानीय स्तर पर बनाए जाने वाले फार्मूलों पंचगव्य रसायन, जैव रसायन, छाछ द्रव्य रसायन, अन्न द्रव्य रसायन आदि का उपयोग कर सकते हैं। पंचमहाभूत संतुलन होने पर फसलों पर बीमारी आती नहीं है। नियमित अग्निहोत्र करना है। गंगा माता से, धरती माता से, पंचमहाभूतों से नियमित प्रार्थना करनी है। इससे खरपतवार नहीं उगेंगे, सिंचाई की मात्रा बहुत घट जाएगी और उत्पाद भी अधिक अधिक प्राप्त होगा। यही मल प्राकृतिक खेती है। यही सतयुग की खेती है।

बीज शोधन प्रक्रिया

विधि

(अ) सबसे पहले बीजों को 2 घण्टे सुबह या शाम का सूर्यप्रकाश दिखाएँ। रात में चंद्रमा की रौशनी भी दिखाएं। 

(ब) बीजों के साफ कमरे में ढेर बनाकर या जूट की बोरी में रखें, फिर बीजों के पास गाय के गोबर के कण्डे जलाकर सुगंधित द्रव्य डालकर धुआं करें। 

(स) बीजों से निम्न तरह की प्रार्थना करें

बीज शोधन के लिए निम्न प्रक्रिया अपनाएं।

एक लीटर पानी में 20 एमएल राह स्वर्ण जल मिलाकर इसमें आधे से एक घंटे तक बीजों को डुबाएं, फिस इसी पानी में ही प्रति लीटर की दर से 2 ग्राम चूना मिलाएं, बीजों को पुनः बीज फूलते तक डुबाएं, (नोट-दलहनी बीजों को डुबाने के स्थान पर उन पर स्प्रे करें।) खेत की मिट्टी फंगस की समस्या हो तो राह ट्राइकोडर्मा मिलाएँ। कीटों की समस्या हो तो बीजों के ऊपर नीम बाण की कोटिंग करें। तत्पश्चात राह भूमिराजा का भुरकाव कर बुवाई करें।

"हे बीज ! मैं आपको अपनी खेती की भूमि में बोने जा रहा हूँ, 

आपका संवर्धन करने जा रहा हूँ, कृपया आप अपनी अंकुरण 

शक्ति जागृत करें, हे ईश्वर इस कार्य मे मेरी मदद करें"

पंच महाभूतों का प्रकृति निर्माण क्रम, TCBT ऊर्जा विज्ञान दर्शन

 ऊर्जा स्त्रोत ऊर्जास्वरूप ऊर्जा प्राप्ति साधन 
भौतिक
 ऊर्जा प्राप्ति साधन
अभौतिक
प्रक्रिया ऊर्जा चक्र रंगशरीर निर्माण
 भूमिरूप  ठोस गोबर यज्ञयम मूलाधार चक्र  लालअन्नमय कोष 
 गगन रंगअति सूक्ष्म  गोमूत्रदान नियम  स्वाधिष्टान चक्रनारंगी प्राणमय कोष 
 वायु गंध सूक्ष्म घीतप आहार मणीपूर चक्र  पीला मनोमय कोष
 अग्नि स्वरतरंग  दहीकर्म विहार अनाहात चक्र हरा विज्ञानमय कोष 
 नीर स्पर्शसूक्ष्म तरंग  छाछ स्वाध्यायप्रत्याहार विशुद्धी चक्र नीला आनंदमय कोष 
 मन ----ध्यान  आज्ञा चक्रजामुनी -
 बुद्धि----धारणा  सहस्त्रार चक्र बैंगनी-
अहम्-कार----समाधि बीज कोष 
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